अब बंगला न छोड़ने की जिद क्यों जब 2015 में लालू ने अपने विधायकों से खुद कहा, मारामारी क्यों? नियम से मिलेगा आवास

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लालू आवास विवाद

पटना: राबड़ी देवी को 39, हार्डिंग रोड आवास आवंटित होने के बाद लालू परिवार को लेकर आवास विवाद फिर सुर्खियों में है। दिलचस्प यह है कि यही लालू प्रसाद यादव कभी मुख्यमंत्री बनने के बाद भी चार महीनों तक अपने पूरे परिवार के साथ चपरासी क्वार्टर में रहे थे—वह क्वार्टर भी उनका नहीं था। उनके दो बड़े भाई पटना वेटनरी कॉलेज में चपरासी (प्यून) थे और कॉलेज परिसर में उन्हें ही क्वार्टर मिला हुआ था। पढ़ाई के लिए फुलवरिया (गोपालगंज) से पटना आने के बाद से ही लालू अपने बड़े भाई के साथ वहीं रहते थे। उनका छात्र जीवन इसी चपरासी क्वार्टर में बीता। 1980 में पहली बार विधायक चुने जाने से लेकर 1988 में नेता प्रतिपक्ष बनने तक, और फिर 1990 में मुख्यमंत्री बनने के बाद भी चार महीने तक वे इसी क्वार्टर में डटे रहे।

सीएम पद की शपथ लेने के बाद चले गये चपरासी क्वार्टर

मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद लालू यादव सीधे चपरासी क्वार्टर लौट गए। इससे प्रशासनिक अधिकारियों को सीएम प्रोटोकॉल लागू करने में काफी मुश्किलें हुईं, क्योंकि आम लोग वहीं उनसे मिलने पहुंचने लगे। लालू ने यह संदेश देने की कोशिश की कि सत्ता का संचालन भव्य दफ्तरों या सजे-धजे भवनों से नहीं, बल्कि खुले आसमान के नीचे आम जनता के बीच बैठकर भी किया जा सकता है।

मुख्यमंत्री बनने के बाद पहला जनता दरबार भी उन्होंने इसी चपरासी क्वार्टर में लगाया। वहां न कोई प्रशासनिक दफ्तर था, न ही किसी तरह की औपचारिक व्यवस्था। एक लकड़ी की चौकी और आसपास रखी तीन–चार काठ की कुर्सियां ही बैठने के लिए होती थीं। सुरक्षा का भी भारी-भरकम इंतजाम नहीं था—कुछ पुलिसकर्मी ही भीड़ संभाल लेते थे। मुख्यमंत्री तक पहुंचने के लिए न अनुमति लेनी पड़ती थी, न ही किसी तरह की जांच से गुजरना पड़ता था। लोग आसानी से पहुंचकर अपनी समस्याएं सीधे उन्हें बता पाते थे।

इस तरीके से लालू यादव यह दिखाना चाहते थे कि वे वास्तव में गरीबों और साधारण लोगों के मुख्यमंत्री हैं।

सत्ता की चौखट पर आम लोग आसानी से पहुंचे

सत्ता की चौखट आम लोगों के लिए पहले जहाँ दूर का सपना लगती थी, वहीं यह एक बड़ा बदलाव था कि अब वे आसानी से पहुँच पा रहे थे। लंबे समय तक आम नागरिकों के लिए सत्ता तक सीधी पहुँच नामुमकिन मानी जाती थी, लेकिन अब लोग मुख्यमंत्री के सामने बैठकर अपनी समस्याएँ बेहिचक बता रहे थे। लालू यादव किसी मुद्दे को सुनते ही पास बैठे अफसर से कहते—“फलां अधिकारी को फोन लगाओ और तुरंत इसका समाधान करो। आज ही निपट जाना चाहिए, कोई बहाना नहीं चलेगा।” उनकी यही कार्यशैली उन्हें लोकप्रियता की ऊँचाईयों पर ले गई। उस दौर में पटना के अखबारों में यह तक लिखा गया—मुख्यमंत्री चपरासी क्वार्टर से बिहार का शासन चला रहे हैं।

लालू सरकार के मंत्री रहे अपने मित्र के घर

यह केवल मुख्यमंत्री लालू यादव ही नहीं थे, जो उस दौर में चमक-दमक से दूर एक सरल जीवन जी रहे थे। उनके मंत्रिमंडल के कई महत्वपूर्ण सदस्य भी इसी सादगी की मिसाल बने हुए थे। प्रमुख मंत्री रामजीवन सिंह अपने मित्र के घर में ही रहते थे और कृषि मंत्री बनने के बाद भी उन्होंने सरकारी बंगला लेने से इनकार कर दिया। जिस घर में वे ठहरे थे, वहाँ टेलीफोन तक की सुविधा नहीं थी। ऊर्जा और सिंचाई मंत्री जगदानंद सिंह भी एक साधारण डाकबंगले में रह रहे थे, जहाँ फोन की व्यवस्था नहीं थी। अन्य मंत्री—वृष्णि पटेल, मंगल सिंह और रमई राम भी छोटे सरकारी आवासों में रहते थे। इन सभी ने मंत्री बनने के बावजूद किसी बड़ी कोठी की मांग नहीं की।

आवास के लिए इतनी मारामारी क्यों, नियम से मिलेगा- लालू यादव

सरकारी बंगलों को लेकर मंत्री और विधायकों का रवैया कैसा होना चाहिए, इसकी सीख खुद लालू यादव ने 2015 में दी थी। लालू–नीतीश गठबंधन के बहुमत में आते ही राजद के दो और जदयू के एक विधायक पर यह आरोप लगा था कि उन्होंने बिना आवंटन के ही पूर्व विधायकों के आवासों पर कब्जा कर लिया। उस समय कहा गया था कि राजद विधायक अरुण कुमार यादव, अनिल कुमार यादव और जदयू विधायक आर.एन. सिंह ने कथित रूप से पहले रहने वाले विधायकों की नेम प्लेट हटाकर अपनी नेम प्लेट लगा दी थी। हालांकि, इस मामले में कोई आधिकारिक या प्रमाणिक शिकायत नहीं मिली थी और आरोप सिर्फ मीडिया रिपोर्टों के आधार पर लगाए गए थे।

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