नई दिल्ली: ओमान ने भारत के हलाल मीट सर्टिफिकेशन को आधिकारिक तौर पर स्वीकार कर लिया है। अब भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। वहीं, भारत सरकार 52 मुस्लिम देशों से सर्टिफिकेशन की मान्यता दिलाने की कोशिश कर रही है. इसी बीच मुस्लिम देश ओमान से इस बात की डील हो गई है. अब ओमान ने भारत के हलाल सर्टिफिकेशन को मान्यता दे दी है।
वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने बताया कि भारत उन देशों से बात कर रहा है जहां मांस उत्पादों के निर्यात के लिए हलाल सर्टिफिकेशन जरूरी है। उन्होंने कहा, ‘पिछले तीन-चार सालों से हम खाड़ी देशों से, जो हलाल उत्पादों के सबसे बड़े खरीदार हैं, यह कोशिश कर रहे हैं कि वे अनौपचारिक तरीकों के बजाय हमारे औपचारिक हलाल सर्टिफाइड उत्पादों को स्वीकार करें।’
ओमान की मान्यता से भारतीय हलाल निर्यात को मिलेगा बढ़ावा, खर्च घटेगा और बाजार में एंट्री होगी आसान — गोयल

ओमान की ओर से भारत के हलाल सर्टिफिकेशन को मान्यता देने से कई फायदे होंगे। इससे बार-बार टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन की जरूरत नहीं पड़ेगी। साथ ही, खर्च कम होगा और भारतीय निर्यातकों के लिए बाजार में पहुंच आसान हो जाएगी। गोयल ने कहा, ‘हम इस बात पर जोर देंगे कि केवल आधिकारिक तौर पर स्वीकृत हलाल सर्टिफिकेशन ही माना जाए। यह एक सही और प्रक्रिया-आधारित हलाल सर्टिफिकेशन है।
i-CAS हलाल सर्टिफिकेशन अब मान्यता प्राप्त एजेंसियों से ही वैध, 15 देशों में अनिवार्य — ओमान, यूएई, बांग्लादेश और अन्य शामिल
सर्टिफिकेशन केवल क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया की ‘इंडिया कन्फॉर्मिटी असेसमेंट स्कीम (i-CAS) हलाल’ के तहत और मान्यता प्राप्त एजेंसियों की ओर से जारी होने पर ही मान्य होता है। अक्टूबर 2024 की एक नोटिफिकेशन में कम से कम 15 देशों की सूची दी गई थी जहां हलाल मांस और मांस उत्पादों के सर्टिफिकेशन की आवश्यकता होती है। इनमें ओमान, यूएई, बांग्लादेश, तुर्किये, फिलीपींस और सिंगापुर जैसे देश शामिल हैं।
सरकारी पहल से भारतीय मांस निर्यातकों को मिलेगा बड़ा मौका, वैश्विक हलाल बाजार में भारत की मजबूत दावेदारी
यह पहल भारतीय मांस निर्यातकों के लिए बड़े अवसर खोलती है। अब वे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी पैठ और मजबूत कर पाएंगे। सरकार की यह पहल भारत को वैश्विक हलाल मांस बाजार में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने में मदद करेगी। यह न केवल आर्थिक रूप से फायदेमंद होगा, बल्कि भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता को भी बढ़ावा देगा।
